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औरैया में जीते जी अपनी ‘तेरहवीं’ कर डाली 65 वर्षीय बुजुर्ग ने 1900 लोगों को कराया शांति भोज

By Ten News One Desk

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औरैया में जीते जी अपनी ‘तेरहवीं’ कर डाली 65 वर्षीय बुजुर्ग ने 1900 लोगों को कराया शांति भोज


टेन न्यूज़ ii 31 मार्च 2026 ii रामजी पोरवाल ब्यूरो,
औरैया।

जनपद के अजीतमल तहसील क्षेत्र के ग्राम लक्ष्मणपुर में एक बेहद अनोखा और भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। यहां 65 वर्षीय राकेश यादव ने अपने जीवित रहते ही अपनी तेरहवीं के रूप में भंडारे का आयोजन कर डाला।

सोमवार को आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत कन्या पूजन से हुई, जिसमें करीब 150 कन्याओं को भोजन कराने के बाद उन्हें बर्तन भेंट किए गए। इसके बाद विशाल भंडारे में पूड़ी, सब्जी और बूंदी के लड्डुओं की व्यवस्था की गई।

दोपहर से देर रात तक चले इस आयोजन में लगभग 1900 लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

राकेश यादव ने अपने रिश्तेदारों का भी विशेष ख्याल रखा। करीब 100 महिला रिश्तेदारों को साड़ियां और लगभग 90 पुरुष रिश्तेदारों को बर्तन भेंट किए गए। बताया जाता है कि राकेश तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं और उनके दोनों छोटे भाइयों का पहले ही निधन हो चुका है। तीनों भाई अविवाहित रहे, जिससे अब वह पूरी तरह अकेले रह गए हैं।

बुजुर्ग राकेश यादव का कहना है कि बुढ़ापे में उनके पास कोई सहारा नहीं है और उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि उनके निधन के बाद उनकी तेरहवीं कौन करेगा। इसी डर और अकेलेपन की पीड़ा ने उन्हें यह अनोखा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को निमंत्रण दिया और अपनी मेहनत-मजदूरी की कमाई व वृद्धावस्था पेंशन से इस भंडारे का आयोजन किया। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आयोजन में पिंडदान जैसी कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं की गई।

यह घटना न केवल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि समाज में बुजुर्गों के अकेलेपन, असुरक्षा और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

औरैया में जीते जी अपनी ‘तेरहवीं’ कर डाली 65 वर्षीय बुजुर्ग ने 1900 लोगों को कराया शांति भोज

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टेन न्यूज़ ii 31 मार्च 2026 ii रामजी पोरवाल ब्यूरो,
औरैया।

जनपद के अजीतमल तहसील क्षेत्र के ग्राम लक्ष्मणपुर में एक बेहद अनोखा और भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। यहां 65 वर्षीय राकेश यादव ने अपने जीवित रहते ही अपनी तेरहवीं के रूप में भंडारे का आयोजन कर डाला।

सोमवार को आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत कन्या पूजन से हुई, जिसमें करीब 150 कन्याओं को भोजन कराने के बाद उन्हें बर्तन भेंट किए गए। इसके बाद विशाल भंडारे में पूड़ी, सब्जी और बूंदी के लड्डुओं की व्यवस्था की गई।

दोपहर से देर रात तक चले इस आयोजन में लगभग 1900 लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

राकेश यादव ने अपने रिश्तेदारों का भी विशेष ख्याल रखा। करीब 100 महिला रिश्तेदारों को साड़ियां और लगभग 90 पुरुष रिश्तेदारों को बर्तन भेंट किए गए। बताया जाता है कि राकेश तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं और उनके दोनों छोटे भाइयों का पहले ही निधन हो चुका है। तीनों भाई अविवाहित रहे, जिससे अब वह पूरी तरह अकेले रह गए हैं।

बुजुर्ग राकेश यादव का कहना है कि बुढ़ापे में उनके पास कोई सहारा नहीं है और उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि उनके निधन के बाद उनकी तेरहवीं कौन करेगा। इसी डर और अकेलेपन की पीड़ा ने उन्हें यह अनोखा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को निमंत्रण दिया और अपनी मेहनत-मजदूरी की कमाई व वृद्धावस्था पेंशन से इस भंडारे का आयोजन किया। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आयोजन में पिंडदान जैसी कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं की गई।

यह घटना न केवल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि समाज में बुजुर्गों के अकेलेपन, असुरक्षा और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

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