फर्रुखाबाद: रोज़े की कबूलियत की निशानियां क्या हैं? उलेमा व जनप्रतिनिधियों ने दी अहम नसीहत

टेन न्यूज़ !! २० फरवरी २०२६ !! तौफीक फारुकी ब्यूरो, फर्रुखाबाद। रमज़ान का मुकद्दस महीना जारी है। यह महीना हर मुसलमान के लिए इबादत, रहमत और मगफिरत का महीना माना जाता है। इस दौरान रोज़ा रखना, पांच वक्त की नमाज़ अदा करना, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करना और नेक कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना खास अहमियत रखता है। लेकिन रोज़ा रखने के बाद अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि उनका रोज़ा अल्लाह की बारगाह में कबूल हुआ या नहीं।
पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत हाजी तहसीन सिद्दीकी ने जानकारी देते हुए बताया कि रोज़े की असल कबूलियत का फैसला अल्लाह तआला ही फरमाते हैं। हालांकि कुछ निशानियों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर रमज़ान के बाद भी इंसान पांच वक्त की नमाज़ का पाबंद रहे, झूठ, गीबत और गुस्से से बचे तथा नेक कामों में दिलचस्पी बनाए रखे, तो यह रोज़े के कबूल होने की अहम निशानी है। अगर कोई व्यक्ति रोज़ा रखकर भी बुराइयों से दूर नहीं रहता, तो वह केवल भूखा रहने तक सीमित रह जाता है।
वहीं छिबरामऊ विधानसभा के पूर्व विधायक ताहिर हुसैन सिद्दीकी ने कहा कि रोज़े की एक बड़ी पहचान यह भी है कि इंसान के दिल में गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद का जज़्बा पैदा हो। रमज़ान के बाद भी यदि वह समाज के कमजोर वर्ग की सहायता करता रहे, तो यह मजबूत संकेत है कि उसका रोज़ा कबूल हुआ।
उलेमा ने भी नसीहत दी कि रोज़े के दौरान नीयत का साफ होना बेहद जरूरी है। इबादत में सच्चाई और तौबा का जज़्बा हो, तो अल्लाह बंदे की दुआ और रोज़े को जरूर कबूल फरमाता है। इसलिए रोज़े की फिक्र से ज्यादा अपनी नीयत और अमल को दुरुस्त रखने पर ध्यान देना चाहिए।






