इटावा: चकरनगर थाने में तैनात आरक्षी विपिन यादव का निधन, पुलिस विभाग में शोक देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर: 20 रुपये की रिश्वत के मामले में 29 साल बाद बरी हुआ कांस्टेबल, अगले दिन मौत सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर ने लगाया हेड कांस्टेबल पर उत्पीड़न का आरोप, SSP ने किया सस्पेंड लखनऊ: विधानसभा सत्र के सुचारु संचालन को लेकर सर्वदलीय बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहभाग किया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महायोगी गुरु गोरखनाथ राजकीय महाविद्यालय का किया निरीक्षण, किया पौधरोपण
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देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर: 20 रुपये की रिश्वत के मामले में 29 साल बाद बरी हुआ कांस्टेबल, अगले दिन मौत

By Ten News One Desk

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देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर: 20 रुपये की रिश्वत के मामले में 29 साल बाद बरी हुआ कांस्टेबल, अगले दिन मौत


टेन न्यूज ii 08 फरवरी 2026 ii डेस्क न्यूज, अहमदाबाद (गुजरात)

“देर से फैसला, अन्याय के बराबर है।” यह कथन न्याय की सुस्त प्रक्रिया का कड़वा सच उजागर करता है।

गुजरात के अहमदाबाद से सामने आये एक अदालती मामले ने यह हकीकत बयाँ कर दी है, जहाँ 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में फँसे एक पुलिस कांस्टेबल को 29 साल बाद बरी किया गया, लेकिन न्याय मिलने के अगले ही दिन उसकी मौत हो गई।

साल 1997 में अहमदाबाद के वेज़लपुर इलाके में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने रिश्वत ठोकने का जाल बिछाया था। उसी कड़ी में एसीबी ने एक ट्रक ड्राइवर से सिर्फ 20 रुपये लेते पकड़े जाने के आरोप में पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति समेत तीन पुलिसकर्मियों को हिरासत में लिया। आरोप था कि उन्होंने वाहन चालक से रिश्वत ली थी।

एसीबी की कार्रवाई के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। मामले की सुनवाई होती रही, साक्ष्य और दलीलों पर विचार चलता रहा।

साल 2004 में अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने शुरुआती फैसले में बाबूभाई प्रजापति तथा अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। पांचवीं अपर्याप्त अपील, खंडपीठ सुनवाई और उच्च न्यायालय में विचार जैसे कई चरणों ने इस केस की गति को और ढीला कर दिया।

लगभग 29 साल बाद, अदालत ने आखिरकार बाबूभाई प्रजापति को आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, इसी अगले दिन कांस्टेबल की मौत हो जाने से यह सनसनीखेज मामला और भावनात्मक रूप से गहराता चला गया। इस लंबी देरी ने सवाल खड़े कर दिये हैं कि क्या इतनी धीमी न्याय प्रक्रिया ही न्याय का अंतिम परिणाम हो सकती है?

विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी-अनंत कानूनी दलीलें, कोर्ट की कामकाज की धीमी गति और प्रकरणों का ढेर ऐसे मामलों को जन्म देते हैं, जहां “न्याय” शब्द का वास्तविक अर्थ खो सा जाता है।

यह मामला न्याय और समय की उस दुर्दशा का प्रतीक बन गया है, जहाँ सूट धारक व्यक्ति को दोषमुक्त घोषित होने तक जीवन ही खर्च हो गया।

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“देर से फैसला, अन्याय के बराबर है।” यह कथन न्याय की सुस्त प्रक्रिया का कड़वा सच उजागर करता है।

गुजरात के अहमदाबाद से सामने आये एक अदालती मामले ने यह हकीकत बयाँ कर दी है, जहाँ 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में फँसे एक पुलिस कांस्टेबल को 29 साल बाद बरी किया गया, लेकिन न्याय मिलने के अगले ही दिन उसकी मौत हो गई।

साल 1997 में अहमदाबाद के वेज़लपुर इलाके में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने रिश्वत ठोकने का जाल बिछाया था। उसी कड़ी में एसीबी ने एक ट्रक ड्राइवर से सिर्फ 20 रुपये लेते पकड़े जाने के आरोप में पुलिस कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति समेत तीन पुलिसकर्मियों को हिरासत में लिया। आरोप था कि उन्होंने वाहन चालक से रिश्वत ली थी।

एसीबी की कार्रवाई के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। मामले की सुनवाई होती रही, साक्ष्य और दलीलों पर विचार चलता रहा।

साल 2004 में अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने शुरुआती फैसले में बाबूभाई प्रजापति तथा अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। पांचवीं अपर्याप्त अपील, खंडपीठ सुनवाई और उच्च न्यायालय में विचार जैसे कई चरणों ने इस केस की गति को और ढीला कर दिया।

लगभग 29 साल बाद, अदालत ने आखिरकार बाबूभाई प्रजापति को आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, इसी अगले दिन कांस्टेबल की मौत हो जाने से यह सनसनीखेज मामला और भावनात्मक रूप से गहराता चला गया। इस लंबी देरी ने सवाल खड़े कर दिये हैं कि क्या इतनी धीमी न्याय प्रक्रिया ही न्याय का अंतिम परिणाम हो सकती है?

विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी-अनंत कानूनी दलीलें, कोर्ट की कामकाज की धीमी गति और प्रकरणों का ढेर ऐसे मामलों को जन्म देते हैं, जहां “न्याय” शब्द का वास्तविक अर्थ खो सा जाता है।

यह मामला न्याय और समय की उस दुर्दशा का प्रतीक बन गया है, जहाँ सूट धारक व्यक्ति को दोषमुक्त घोषित होने तक जीवन ही खर्च हो गया।

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