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काठगढ़ महादेव : एक चमत्कारी शिवलिंग, आस्था, इतिहास और विज्ञान का संगम

By Ten News One Desk

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काठगढ़ महादेव : एक चमत्कारी शिवलिंग, आस्था, इतिहास और विज्ञान का संगम


टेन न्यूज़ !! ११ जुलाई २०२५ !! नरेश शर्मा ब्यूरो, दिल्ली


नमस्कार! आप देख रहे हैं टेन न्यूज़, मैं हूँ नरेश शर्मा, और आज हम आपको लेकर चलेंगे उत्तर भारत के एक ऐसे दिव्य और रहस्यमयी शिवधाम की ओर, जिसका उल्लेख न केवल शिव पुराण में मिलता है, बल्कि जिसका संबंध रामायण काल, सिकंदर महान, और महाराजा रणजीत सिंह जैसे ऐतिहासिक चरित्रों से भी जुड़ा है।

हम बात कर रहे हैं — काठगढ़ महादेव मंदिर की। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत है, क्योंकि यहां भगवान शिव का विशाल शिवलिंग दो भागों में विभाजित है — एक भाग को मां पार्वती और दूसरे को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन दोनों भागों के बीच की दूरी ग्रह-नक्षत्रों के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। यह एक रहस्यमयी वैज्ञानिक-आध्यात्मिक घटना है, जो इस स्थान को विशेष बनाती है।

वीओ: शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर संघर्ष हुआ, तो भगवान शिव ने एक अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट होकर दोनों का अहंकार तोड़ा। यही अग्निस्तंभ आगे चलकर काठगढ़ महादेव शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

वीओ: ऐसा कहा जाता है कि जब प्रभु श्रीराम के भाई भरत अपने ननिहाल कैकेय देश (आज का कश्मीर) जाते थे, तो वे इसी मार्ग से होकर इस पावन स्थल पर आते और स्वयंभू शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते थे। यह स्थान तब भी आस्था का केंद्र था।

वीओ: इतिहासकारों के अनुसार, मकदूनिया का राजा सिकंदर जब भारत विजय पर निकला, तो उसका अंतिम पड़ाव व्यास नदी के किनारे था, जो संभवतः मीरथल क्षेत्र के पास माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, सिकंदर के सैनिकों ने यहां की वीरता और रहस्यमयी शक्तियों से प्रभावित होकर आगे बढ़ने से मना कर दिया, और यहीं से उसका लौटना तय हुआ। कहा जाता है कि सिकंदर ने काठगढ़ में शिवलिंग के चारों ओर दीवार और चबूतरे बनवाए, ताकि इस देवस्थल को सम्मान मिल सके।

वीओ: सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस स्वयंभू शिवलिंग पर श्रद्धा जताते हुए यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया। कहा जाता है कि वे यहां के पवित्र जल को शुभ कार्यों के लिए मंगवाते थे। मंदिर परिसर में स्थित अष्टकोणीय शिवलिंग, कुआं, समाधि और परिक्रमा स्थल इसकी शक्ति और वास्तुकला की विलक्षणता को दर्शाते हैं।

काठगढ़ महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता प्रमाण है। जहां आस्था, विज्ञान और इतिहास — तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

ऐसे स्थलों की जानकारी हम सभी को न केवल गौरवान्वित करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि हमारी परंपराएं सिर्फ भावनात्मक नहीं, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक आधारों से भी जुड़ी हुई हैं।

टेन न्यूज़ के लिए दिल्ली से ब्यूरो रिपोर्ट, नरेश शर्मा।

काठगढ़ महादेव : एक चमत्कारी शिवलिंग, आस्था, इतिहास और विज्ञान का संगम

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टेन न्यूज़ !! ११ जुलाई २०२५ !! नरेश शर्मा ब्यूरो, दिल्ली


नमस्कार! आप देख रहे हैं टेन न्यूज़, मैं हूँ नरेश शर्मा, और आज हम आपको लेकर चलेंगे उत्तर भारत के एक ऐसे दिव्य और रहस्यमयी शिवधाम की ओर, जिसका उल्लेख न केवल शिव पुराण में मिलता है, बल्कि जिसका संबंध रामायण काल, सिकंदर महान, और महाराजा रणजीत सिंह जैसे ऐतिहासिक चरित्रों से भी जुड़ा है।

हम बात कर रहे हैं — काठगढ़ महादेव मंदिर की। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत है, क्योंकि यहां भगवान शिव का विशाल शिवलिंग दो भागों में विभाजित है — एक भाग को मां पार्वती और दूसरे को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन दोनों भागों के बीच की दूरी ग्रह-नक्षत्रों के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। यह एक रहस्यमयी वैज्ञानिक-आध्यात्मिक घटना है, जो इस स्थान को विशेष बनाती है।

वीओ: शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर संघर्ष हुआ, तो भगवान शिव ने एक अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट होकर दोनों का अहंकार तोड़ा। यही अग्निस्तंभ आगे चलकर काठगढ़ महादेव शिवलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

वीओ: ऐसा कहा जाता है कि जब प्रभु श्रीराम के भाई भरत अपने ननिहाल कैकेय देश (आज का कश्मीर) जाते थे, तो वे इसी मार्ग से होकर इस पावन स्थल पर आते और स्वयंभू शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते थे। यह स्थान तब भी आस्था का केंद्र था।

वीओ: इतिहासकारों के अनुसार, मकदूनिया का राजा सिकंदर जब भारत विजय पर निकला, तो उसका अंतिम पड़ाव व्यास नदी के किनारे था, जो संभवतः मीरथल क्षेत्र के पास माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, सिकंदर के सैनिकों ने यहां की वीरता और रहस्यमयी शक्तियों से प्रभावित होकर आगे बढ़ने से मना कर दिया, और यहीं से उसका लौटना तय हुआ। कहा जाता है कि सिकंदर ने काठगढ़ में शिवलिंग के चारों ओर दीवार और चबूतरे बनवाए, ताकि इस देवस्थल को सम्मान मिल सके।

वीओ: सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस स्वयंभू शिवलिंग पर श्रद्धा जताते हुए यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया। कहा जाता है कि वे यहां के पवित्र जल को शुभ कार्यों के लिए मंगवाते थे। मंदिर परिसर में स्थित अष्टकोणीय शिवलिंग, कुआं, समाधि और परिक्रमा स्थल इसकी शक्ति और वास्तुकला की विलक्षणता को दर्शाते हैं।

काठगढ़ महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता प्रमाण है। जहां आस्था, विज्ञान और इतिहास — तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

ऐसे स्थलों की जानकारी हम सभी को न केवल गौरवान्वित करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि हमारी परंपराएं सिर्फ भावनात्मक नहीं, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक आधारों से भी जुड़ी हुई हैं।

टेन न्यूज़ के लिए दिल्ली से ब्यूरो रिपोर्ट, नरेश शर्मा।

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